सप्रे संग्रहालय में 'इतिहास के शोध-अध्ययन में मौखिक साक्ष्य का महत्व' विषय पर व्याख्यान

दौर विशेष के परिवेश से जोड़ता है मौखिक इतिहास
 
सप्रे संग्रहालय में 'इतिहास के शोध-अध्ययन में मौखिक साक्ष्य का महत्व' विषय पर व्याख्यान
 
  भोपाल। इतिहास लेखन या उसे समझने में मौखिक इतिहास की बड़ी भूमिका होती है। मौखिक इतिहास के जरिए हम उस दौर विशेष के पूरे परिवेश से परीचित हो सकते हैं। अभी तक संग्रहालयों में उपलब्ध स्त्रोतों के आधार पर ही इतिहास लिखा या पढ़ा जाता रहा है। लेकिन पिछले कुछ समय से समग्र इतिहास को समझने की अवधारणा बनी है। यह कहना है सुप्रसिद्ध इतिहासविद्,साहित्यकार और राष्ट्रीय अभिलेखागार के महानिदेशक पंकज राग का। वे शनिवार को माधवराव सप्रे संग्रहालय में आयोजित व्याख्यान में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहे थे। 'इतिहास के शोध-अध्ययन में मौखिक साक्ष्य का महत्वÓ   विषय पर आयोजित व्याख्यान सत्र की अध्यक्षता मानव संग्रहालय के निदेशक एवं मानवशास्त्री प्रो. सरित कुमार चौधुरी कर रहे थे।  
 
 इतिहास के विभिन्न संदर्भों का जिक्र करते हुए पंकज राग ने कहा कि मौखिक इतिहास  जनश्रुतियां, लोकोक्तियां, लोक कविताएं आदि की शक्ल में आता है। इनमें उस समय की लोक चेतना, लोगों की आशा-अपेक्षा, निराशा और आक्रोश सभी कुछ समाया रहता है। इससे हम सहजता के साथ उस दौर को समझ सकते हैं। अपने वक्तव्य में उन्होंने विशेषकर 1857 की क्रांति को ही केन्द्र में रखा। उन्होंने कहा कि इस दौर में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लोगों में गजब का आक्रोश था। यही आक्रोश उस समय के किस्से कहानियों तथा कविताओं में मिलता है। अपने कथन के समर्थन में उन्होंने कवि सुखदेव की कुछ पंक्तियां भी सुनाईं। 
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे प्रो. सरित कुमार चौधुरी ने कहा कि लिखित दस्तावेजों में उपलब्ध साहित्य जरूरी नहीं कि प्रामाणिक ही हो। हो सकता है कि उस समय के शासकों ने अपने मुताबिक उसे लिखा हो। लेकिन मौखिक साक्ष्य आंखन देखी घटनाएं हैं जो सदियों से एक-दूसरे को शब्दों के जरिए हस्तांतरित हो रही हैं। इसलिए इनकी प्रामाणिकता सत्य के करीब होती हैं। प्रो. चौधुरी ने पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश की एक घटना का जिक्र करते हुए बताया कि वहां की आदि जनजाति के लोगों ब्रिटिश अधिकारियों के जुल्म से तंग आकर उसकी हत्या कर दी। इसके बाद ब्रिटिश आर्मी ने दंडात्मक आदेश जारी कर कड़ा प्रतिशोध लिया। बाद में दस्तावेजों में इस जनजाति के लोगों को ही इस सबके लिए दोषी करार दिया। जबकि हकीकत कुछ और ही थी। यह वास्तविकता मौखिक इतिहास से ही सामने आ सकती है। 
 
 
आरंभ में संग्रहालय के अध्यक्ष राकेश पाठक ने अतिथियों का स्वागत् किया। इस अवसर पर संग्रहालय के संस्थापक निदेशक पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर, निदेशक डॉ. मंगला अनुजा, पूर्व महापौर प्रो. मधु गार्गव, साहित्यकार किशन पंत, मुकेश वर्मा, इतिहासविद् शंभुदयाल गुरु सहित अनेक प्रबुद्धजन मौजूद थे। कार्यक्रम का संचालन प्रो. रत्नेश ने किया।                              
Shri Pankaj Raag, Joint Secretary, Ministry of Culture, Govt of India today on 14th May, 2016 delivered a special lecture on 'Itihas ke Shodh Adhyayan me Maukhik Sakchhyon ka mahatv' at Madhav Rao Sapre Smriti Samachar Patra Sangrahalaya evam Shodh Sansthan, Bhopal. Addressing the gathering Shri Raag emphasised the importance of oral traditions in understanding History. Citing examples from folk songs Shri Raag told that study of folk songs of the pre independence period give an idea of those people and how they understood and interpret their heroes. Prof. Sarit Kumar Chaudhuri, Director, Indira Gandhi Rashtriya Manav Sangrahalaya chaired the lecture. In his address Prof. Chaudhuri cited examples from colonial history of arunachal pradesh and said that writing of History less depended on official documents and linked more with the life of common people can give a much inclusive idea of our nation state.

Updated date: 14-05-2016 08:10:01